सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ख्वाब की ज़ुस्तज़ु

ख्वाब की ज़ुस्तज़ु में सवेरा न मिला,, परिंदे हिजरत से लौटे तो बसेरा न मिला,,, (प्रेम तपस्वी)

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

शीशे की निगेहबानी

 पत्थर को शीशे की निगेहबानी मिल गई,,, आग को और जलाने वाली पानी मिल गई,, किसने बांध बनाया होगा पानी के ऊपर,, टूटा बांध तो दरिया को रवानी मिल गई, जीवन का हर सफ कोरा था अफसानों के बिन,, ज़ख्म लगा जब कातिब को कहानी मिल गई,,, (प्रेम तपस्वी)