कोई इरादा नहीं था कि तुझसे बिछड़ जाऊ मै,,,
तू बद्दुआ देती थी अक्सर। कि मर जाऊ मै,,,
इक तेरे कांधे के सिवा मै हर कहीं हस तो लेता हूं,,,
अब तू ये बता कि रोने को किधर जाऊं मैं,,,
रेत बन के आया हूं अब तेरे दामन में रहने,,,
इतनी बेरुखी से ना झटक कि बिखर जाऊं मै,,,,
बन के सफेदी ताउम्र तेरे बालों में रहना गंवारा मुझे,,,
क्या फायदा हिना होकर अपने रंग से उतर जाऊं मै,,,,
(प्रेम तपस्वी)
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