कोई इरादा नहीं था कि तुझसे बिछड़ जाऊ मै,,, तू बद्दुआ देती थी अक्सर। कि मर जाऊ मै,,, इक तेरे कांधे के सिवा मै हर कहीं हस तो लेता हूं,,, अब तू ये बता कि रोने को किधर जाऊं मैं,,, रेत बन के आया हूं अब तेरे दामन में रहने,,, इतनी बेरुखी से ना झटक कि बिखर जाऊं मै,,,, बन के सफेदी ताउम्र तेरे बालों में रहना गंवारा मुझे,,, क्या फायदा हिना होकर अपने रंग से उतर जाऊं मै,,,, (प्रेम तपस्वी)
पत्थर को शीशे की निगेहबानी मिल गई,,, आग को और जलाने वाली पानी मिल गई,, किसने बांध बनाया होगा पानी के ऊपर,, टूटा बांध तो दरिया को रवानी मिल गई, जीवन का हर सफ कोरा था अफसानों के बिन,, ज़ख्म लगा जब कातिब को कहानी मिल गई,,, (प्रेम तपस्वी)
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