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शीशे की निगेहबानी

 पत्थर को शीशे की निगेहबानी मिल गई,,,


आग को और जलाने वाली पानी मिल गई,,


किसने बांध बनाया होगा पानी के ऊपर,,


टूटा बांध तो दरिया को रवानी मिल गई,


जीवन का हर सफ कोरा था अफसानों के बिन,,


ज़ख्म लगा जब कातिब को कहानी मिल गई,,,


(प्रेम तपस्वी)

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